July 25, 2017

कित गए बदरा पानी वारे ?



अखबार में ,टी वी में खबरें सुन रहे थे कि इस बार बारिश बहुत हो रही है ,दिल्ली में बारिश हो रही होगी,नहीं हुई तो हो जाएगी ,यही मन में लिए अमीरात की भयंकर गर्मी से निकल कर भारत की ओर चले .

भारत भूमि पर क़दम रखते ही सोचा इस बार सावन के महीने में बरखा रानी का आनंद मिलेगा.
गर्मी के मौसम से राहत  मिलेगी,परन्तु इतनी उमस भरी गरमी से दो चार होना पड़ रहा है ,जिसे देखकर लगता है कि अगर यही हाल रहा तो आगे 'सावन का महीना, पवन करे सोर' गीत सब झूठ ही लगने लगेंगे.
न पवन न बादल किसी का शोर नहीं .

आसपास कहीं से कोयल ज़रूर कूकती सुनायी देती है ,मैंने पूछा कि जब सावन में बरखा की झड़ी नहीं तो ये क्यूँ कूक रही है ,तब पता चल कि कूक कर यह अपने बच्चे को बुलाती है.
वहीँ कहीं गीत बज रहा है 'सावन के दिन आए ,सजनवा आन मिलो'..रेडिओ वालों के लिए ये गीत अवसर के अनुसार बजते हैं ,अब सच में  इस सजनी से पूछें कि क्या साजन इस उमस भरे मौसम में मिलने के लिए बुलाये जा सकते हैं?

सावन का महीना झूलों के लिए जाना जाता था ,लेकिन अब झूले दीखते नहीं ,गाँव देहात में भी नहीं.उत्तर प्रदेश में घेवर खाने का महीना भी यही है ,अब यह मिठाई भी गिनी -चुनी दुकानों में मिलती है.
मौसम में परिवर्तन के लिए पर्यावरण प्रदूषण और न जाने कितने अन्य कारणों को गिनवाया जा सकता है लेकिन जो  सांस्कृतिक परिवर्तन भी हो रहे हैं उसका क्या ?
बादल छाकर चले जाते हैं ,हल्का-फुल्का  कभी बरस भी गए तो उसके बाद इतनी उमस कर जाते हैं कि पूछो न!

देखें राखी बाद , भादों लगते मौसम बदलेगा या नहीं  ?


July 1, 2017

पैरों के पर !

कविवर ब्लॉगर राजेंद्र स्वर्णकार जी का सन्देश मिला कि आज ब्लॉग दिवस है तो सभी ब्लॉगर अपनी एक पोस्ट अवश्य पोस्ट करें .पोस्ट लिखने का मन नहीं था लेकिन 'ब्लॉग जगत के पुराने दिन लाने के जो प्रयास किये जा रहे हैं ,उसमें अपना योगदान दिए बिना न रह सकती थी  इसलिए यही आत्मालाप पोस्ट के रूप में प्रस्तुत है -

जून १६ से १७ 

--------२०१६ ,जून महीने से २०१७ का जून महीना ...
इस पिछले एक साल में इतना कुछ अनुभव किया जिसपर आराम से एक किताब लिखी जा सकती है!
बहुत बार ग्रहों -नक्षत्रों की चाल पर यूँ ही विश्वास नहीं जागने लगता ,क्योंकि इतना अनापेक्षित घटने लगता है कि अचानक एक दिन आप
अपने दिमाग की सभी खिड़कियाँ बंद करके यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं अब मैं सिर्फ अपने काम करता जाऊँगा ..क्या होगा  क्या नहीं ,ऊपर वाला जाने ! और यही तो गीता  का भी उपदेश है कि कर्म किये जाओ फल की इच्छा न करो ...

लेकिन इस स्थिति पर पहुँचने के लिए या इस स्थिति को समझ कर ग्रहण करने के लिए आपको कई ऐसे अनुभवों से गुज़रना पड़ता है जिनसे आप सीखते भी जाते हैं और उन सीखों को साथ -साथ जीवन में उतारते चले जाते हैं.हाँ पहली बार भगवद गीता का पूरा पाठ और पुनर्पाठ भी किया ताकि अपने प्रश्नों के उत्तर पा सकूँ लेकिन लगता है इस पुस्तक को फिर से पढ़ना होगा .कई अनुत्तरित प्रश्न अब भी हैं.

 इस एक साल  में मैंने यात्रायें भी इतनी की कि लगने लगा है कि मेरे पाँव में पहिये बाँध दिए गए हैं.
एक हफ्ते बाद फिर से यात्रा की तैयारी है ! आशा है इस बार यह कुछ अच्छी खबर और अच्छे अनुभव दे कर जाएगी.
यात्राओं के अनुभव चित्र सहित अगली बार ...
तो अब ब्लॉग जगत को पुराने रूप में वापस लाने के 'ताऊ रामपुरिया जी ' के इस प्रशंसनीय प्रयास में सहयोग देते हुए  'हिंदी  ब्लॉग दिवस' पर  ब्लॉग -यात्रा पर निकला जाए ...राम-राम !
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

March 12, 2017

होली की शुभकामनाएँ!

उत्तर प्रदेश में १४ साल बाद पूर्ण बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत के लिए भी सभी भारतीयों को ढेरों बधाई!



January 29, 2017

रानी पद्मिनी की शौर्य गाथा

मेवाड़ की रानी पद्मिनी
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वीरों की धरती राजस्थान ....
जहाँ के इतिहास में  अपनी आन-बान  के लिए बलिदान होने वालों की अनेक गाथाएँ वर्णित हैं.

एक कवि ने राजस्थान के वीरों के लिए कहा है :
"पूत जण्या जामण इस्या मरण जठे असकेल
सूँघा सिर, मूंघा करया पण सतियाँ नारेल"

वीरांगना रानी पद्मिनी - कल्पना नहीं इतिहास का सच है !

वीरांगना रानी पद्मावती - कल्पना नहीं इतिहास का सच है !
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फिल्म 'जागृति' का एक लोकप्रिय गीत है -'आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झांकी हिन्दुस्तान की ' ...उसमें भी राजस्थान की धरती का परिचय रानी पद्मिनी के बलिदान से दिया जा रहा है.


जिन राजपूतों के शौर्य और पराक्रम की गाथाएँ दुनिया गाती है ,आज उनके इतिहास से छेड़छाड़ की बात बहुत दुःख देती है और इस समाज की लाचारी  भी दर्शाती है कि लोकतंत्र में अपनी कुर्सी  बचाने वाले  रीढ़विहीन    प्रतिनिधि और कला के नाम पर मात्र व्यवसायिक पहलुओं को देखने वाला बड़ा वर्ग इनके स्वर को अनसुना कर रहा है.

और इसी देश में  वे लोग हैं जिन्हें इतिहास के तथ्यों से  मतलब नहीं है वे मात्र विरोधियों की हाँ में हाँ मिलाना जानते हैं.'घर फूँक तमाशा देखने वालों की तरह !'

August 10, 2016

माही--एक लघु फिल्म-एक प्रयास

अपनी लिखी एक छोटी सी कहानी को फिल्म के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है.
आशा है आपको पसंद आएगा....

अवधि-3 मिनट ४० सेकंड     Time: 3 Minutes 40 Sec

इंटरनेट की स्पीड धीमी है और फिल्म अगर लोड  न हो रही हो तो  विडियो सेटिंग में quality२४० कर लें इससे  फिल्म जल्दी load हो जायेगी.

अपने सुझाव या टिप्पणी अवश्य दीजियेगा.

June 25, 2016

परिवर्तन

परिवर्तन जीवन का  शाश्वत नियम है.
जो इस पल है बिलकुल वैसा ही अगला पल नहीं होगा यह भी तय है..
यह सब हमेशा से ही सुनते आये हैं और सुनते रहेंगे ,महसूस करना और इस कथन को जीने में भी फर्क है...
जब इस कथन को जीना पड़ता है ,तब तकलीफ होती है .
बीता हुआ कल लौटेगा नहीं ..उस कल की यादें रह जाएँगी.

February 12, 2016

मदनोत्सव का स्वागत करें ...

चित्र-अल्पना 

 मदनोत्सव [बसंत पंचमी ] से बसंत ऋतु का आगमन हुआ इसका स्वागत कर रही हूँ ,



January 11, 2016

सेल्फ़ी-वेल्फ़ी,सेल्फ़ाईटीस


सेल्फ़ी लेते समय तीन लडकियाँ समुद्र में डूबीं और उन्हें बचाने के लिए गया युवक  भी लापता !यह कल ही का समाचार था जिसे सुनकर मैं एक बार फिर सोच में पड़ गयी कि आखिर यह लत है या बीमारी? इससे पहले भी आये दिन सेल्फ़ी लेते हुए दुर्घटनाओं की खबरें पढ़ी हैं लेकिन पिछले कुछ दिनों से यह कुछ ज्यादा ही होने लगी हैं.यकीनन यह चिंता का विषय है.


December 31, 2015

'जाते हुए ये पल-छिन'

[Pic by me In Green Mubazarrah Al Ain- morning  at7 Am]

समय अपनी गति से चलता रहता है .यह किसी का गुलाम नहीं है ,शुक्र है समय की गति को नियंत्रित करने का या अपने मन मुताबिक़ चला सकने का कोई यंत्र इंसान ने इजाद नहीं किया और न ही शायद कभी कर सकेगा.

अंग्रेजी नए साल २०१६ आज रात्रि बारह बजे के बाद शुरू हो जाएगा और इसका स्वागत भव्य तरीके से करने के लिए सभी ने अपने स्तर पर तैयारियाँ भी कर ही ली होंगी.

२०१५ का उत्तरार्ध मेरे लिए काफी पेचीदा रहा..इतनी भाग दौड़ पिछले कई वर्षों में कभी नहीं की होगी.जुलाई में शुरू की गयी यात्रा ने मुझे पहियों पर बैठाए रखा ..यह वर्ष कई मायनों में मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण रहा .
जुलाई  माह में विपासना शिविर से जुड़ने का सपना पूरा हुआ ,जब से विपसना ध्यान पद्धति के विषय में अंतर्जाल पर पढ़ा था तब से उत्सुकता थी और साथ ही कुछ था भीतर जो मुझे इस शिविर में जाने को प्रेरित कर रहा था.१० दिन का अनुभव मन  में स्थिरता लाने में सहायक हुआ साथ ही जीवन की एक बड़ी सच्चाई से रूबरू करवा गया कि सब कुछ परिवर्तनशील है..इस कथन को महसूस किया.

September 11, 2015

छाया-माया

प्रिय माया ,

बहुत दिनों से तुमने मुझे खुद से दूर रखा है पर यह तुम भी जानती हो कि छाया के बिना तुम भी अकेली हो.
छाया तुम्हारी अनुकृति ही तो है..तुम्हारी भावनाओं से अछूती नहीं है फिर भी तुम अँधेरे जा बैठी हो.


March 31, 2015

आस का दीप!


आजकल के जो सामाजिक हालात हैं ऐसे में खुल कर, खिलकर खुलकर जी पाना /उत्सव  मनाना शायद हर किसी के बस में  नहीं या हर किसी के दिल में अब वो उत्साह भी नहीं है !कुछ लिखने का प्रयास किया है ,
कविता जैसा बन पड़ा है..संशोधन हेतु सुझाव आमंत्रित हैं.